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Book Description
नीलाचल पर्वत पर जब कोई यात्री पहली बार कामाख्या की ओर बढ़ता है, तो वह केवल एक मंदिर की यात्रा नहीं कर रहा होता। वह अनजाने ही हजारों वर्षों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा की ओर बढ़ रहा होता है, जिसमें देवी को केवल किसी दूरस्थ स्वर्गीय सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि जीवन, सृष्टि, इच्छा, प्रकृति और चेतना की मूल शक्ति के रूप में देखा गया है।